मंगलवार, 14 अप्रैल 2009

ग़ज़ल 13

ज़र्फ़ की मीजान पर हर दोस्त पहचाना गया
हम ज़रा सी बात पर रूठे तो याराना गया

हम जो उनकी बज्म से दामन झटक कर चल दिए
खुश हुए, कहने लगे, अच्छा है दीवाना गया

मैं तो तौबा पर था कायम अपनी ऐ शेखे हरम
ले के मुझ को मयकदे में शौके रिन्दाना गया

देखता किस दिल से उसको इश्क में जलते हुए
शम्-ऐ-सोज़ाँ की तरफ़ ख़ुद बढ़ के परवाना गया

हर तरफ महफिल में उसकी कहकहों की गूँज थी
मैं सुनाने उसको नाहक गम का अफसाना गया

यक बयक रुख पर सभी के इक उदासी छ गयी
उठके तेरी बज्म से जब तेरा दीवाना गया

क्यों न करता वह सितमगर ऐ मयंक उसको कबूल
जिसकी खिदमत में मैं लेकर दिल का नजराना गया

3 टिप्‍पणियां:

  1. अच्छा लिखा है आपने , इसी तरह अपने विचारों से हमें अवगत करते रहे , हमें भी उर्जा मिलेगी

    धन्यवाद
    मयूर
    अपनी अपनी डगर

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  2. मयूर जी,रचनाएँ पसंद करने के लिए शुक्रगुजार हूँ. आप ने तो बहुत बड़े काम का बीडा उठाया हुआ है. आप हम जैसों को बहुत ज्ञान बाँट रहे है.

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