बुधवार, 10 जून 2009

गजल 26

मेरे आंसू गरचे मेरी दास्ताँ कहते रहे
कहने वाले फ़िर भी मुझको बेज़बा कहते रहे।
और कुछ कहने की फुर्सत जिंन्दगी ने दी कहाँ
उम्र भर हम अपने गम की दास्ताँ कहते रहे।
कर दिया बरबाद जिसकी मेहरबानी ने हमें
हम उसी नामेहरबाँ को मेहरबां कहते रहे।
जिनके दम से थी बहुत महफूज़ शाखे-आशियाँ
हम उन्हीं तिनकों को अपना आशियाँ कहते रहे।
जिसने ख़ुद लूटा सरे मंजिल हमारा कांरवा
हम उसी को अपना मीरे-कांरवा कहते रहे।
जिसकी मिट्टी ने हमारे जिस्म को बख्शी जिला
उम्र भर हम उस जमीं को आसमां कहते रहे।
खाना-ऐ-दिल में हमारे जो मकीं है ऐ 'मयंक'
तौबा-तौबा हम उसी को लामकां कहते रहे।

5 टिप्‍पणियां:

  1. kahane ko shabda nahi hai ......par itana hi yaad rah gaya hai wo hai....waah... waah ...waah....waah

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  2. जिसने ख़ुद लूटा सरे मंजिल हमारा कांरवा
    हम उसी को अपना मीरे-कांरवा कहते रहे।

    Mayank ji......... itni lajawaab gazal aur is sher ke kya kahe, apne aap vaah nikal gayaa dil se

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  3. जिसने ख़ुद लूटा सरे मंजिल हमारा कांरवा
    हम उसी को अपना मीरे-कांरवा कहते रहे

    बेहतरीन...वाह..मयंक जी वाह...
    नीरज

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  4. सभी शेर पसंद आये
    खूबसूरत गजल

    मतला और पहला शेर तो क़यामत है

    वीनस केसरी

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