शुक्रवार, 19 जून 2009

गजल 30

तुमने जिसकी जिन्दगी पामाल की

दो इजाज़त उसको अर्जे हाल की


भर लिए दामन में अपने अश्के गम

जिंदगी यूं हमने मालामाल की


इश्क फ़िर फरमाईये किबला हुजूर

फ़िक्र कीजे पहले आटे दाल की


मैं गुजारिश रहम की करता नहीं

दो सजा मुझ्कू मेरे आमाल की


तोड़ कर उड़ जाएगा एक दिन परिन्द

बंदिशे जितनी हैं मायाजाल की


जंग में माँ की दुआएं साथ हैं

क्या ज़रूरत है मुझे अब ढाल की


कम से कम ही बैठ पाती हैं 'मयंक'

पालकी में बेटियाँ कंगाल की

2 टिप्‍पणियां:

  1. कम से कम ही बैठ पाती हैं 'मयंक'

    पालकी में बेटियाँ कंगाल की ।

    bahut hi badhiya.............kash yah samaaj samajh paati

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  2. जंग में माँ की दुआएं साथ हैं
    क्या ज़रूरत है मुझे अब ढाल की
    कम से कम ही बैठ पाती हैं 'मयंक'
    पालकी में बेटियाँ कंगाल की ।
    yeh panktiyaan bahut hi sunder lgai.....
    Surinder

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