शनिवार, 13 जून 2009

गजल 27

हम किसे अपना बनायें शाम ढल जाने के बाद
हाले दिल किसको बतायें शाम ढल जाने के बाद ।

क्या करें जब दिल के अरमानों को सुलगाती हैं ये
उनके कूचे की हवायें शाम ढल जाने के बाद ।

जब भी मुड़ कर देखता हूँ कुछ नजर आता नहीं
कौन देता है सदायें शाम ढल जाने के बाद।

उगते सूरज की इबादत की जिन्होंने उम्र भर
जश्न वह कैसे मनायें शाम ढल जाने के बाद ।

बज्म में वह माहरू जब बेनकाब आने को है
किसलिए दीपक जलायें शाम ढल जाने के बाद।

चूमता हूँ मैं नये अशआर अपने यूं 'मयंक'
चूमे ज्यों बच्चों को मायें शाम ढल जाने बाद।

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर मयंक जी। वाह।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail

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  2. kisliye dipak jalaayen shaam dhal jaane k baad .....
    waah waah
    ghazal mubaraq !

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  3. बहुत उम्दा किस्म के शेरों के लिये आपकी बधाई...
    बहुत बेहतरीन गजल है

    उगते सूरज की इबादत की जिन्होंने उम्र भर
    जश्न वह कैसे मनायें शाम ढल जाने के बाद ।

    ये शेर ख़ास पसंद आया
    वीनस केसरी

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  4. kya bat he....kya baat he kya baat he..sb dunaya se alag duniya he ye..gazals shayri...kvitaaye..wow...adbhut sansaar he..yaar

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  5. उगते सूरज की इबादत की जिन्होंने उम्र भर
    जश्न वह कैसे मनायें शाम ढल जाने के बाद ।
    ..gjab...wonderful..jiyo yaar..or mdhushala esa hi piyo.

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