तअस्सुब के अंधेरों को मिटायें तो उजाला हो
कोई दीपक मुहब्बत का जलाएं तो उजाला हो
उदासी का अँधेरा हर तरफ छाया है महफिल में
वो आकर अंजुमन में मुस्कुराएँ तो उजाला हो
जिन्होंने चाँद सा चेहरा छुपा रक्खा है घूंघट में
वो घूंघट अपने चेहरे से हटायें तो उजाला हो
अभी तो जहन-ओ-दिल पर बदगुमानी की सियाही है
यकीं वो अपनी चाहत का दिलाएं तो उजाला हो
ये कैसी शर्त रख दी है चमन के बागबानों ने
की हम ख़ुद आशियाँ अपना जलाएं तो उजाला हो
चरागों की हर इक लौ आज तूफानों की जद में है
हिफाजत ख़ुद करें इनकी हवाएं तो उजाला हो
मयंक इतना अँधेरा है हताशा और निराशा का
कोई सूरज उमीदों का उगायें तो उजाला हो ॥
शनिवार, 17 अक्टूबर 2009
गुरुवार, 17 सितंबर 2009
गजल- 33
जो दिल रखते नहीं उनको मुहब्बत हो नहीं सकती
फरिश्तों के मुकद्दर में ये दौलत हो नहीं सकती
मुझे डॉलर से बढ़कर अपनी मिट्टी से मुहब्बत है
परस्तारे-वतन हूँ, मझ से हिजरत हो नहीं सकती
महाभारत हो, करबल हो, यही पैगाम देते हैं
कभी नेकी बदी के बीच बैअत हो नहीं सकती
ये फित्नाकार जितना चाहें उतनी कोशिशें कर लें
कयामत से मगर पहले कयामत हो नहीं सकती
वो जन्नत की गली हो या कोई दीगर हसीं शय हो
मेरे भारत से बढ़कर खूबसूरत हो नहीं सकती
वतन की आबरू जिनको नहीं है जान से प्यारी
कभी सीमाओं की उनसे हिफाजत हो नहीं सकती
ये गूंगापन, ये सजदे, बेड़ियाँ और रेंगते रहना
मैं कैसे मान लूँ यारो बगावत हो नहीं सकती
पड़ोसी के फ़राइज़ गर मयंक अपनाएं हम दोनों
उन्हें हमसे, हमें उनसे शिकायत हो नहीं सकती
फरिश्तों के मुकद्दर में ये दौलत हो नहीं सकती
मुझे डॉलर से बढ़कर अपनी मिट्टी से मुहब्बत है
परस्तारे-वतन हूँ, मझ से हिजरत हो नहीं सकती
महाभारत हो, करबल हो, यही पैगाम देते हैं
कभी नेकी बदी के बीच बैअत हो नहीं सकती
ये फित्नाकार जितना चाहें उतनी कोशिशें कर लें
कयामत से मगर पहले कयामत हो नहीं सकती
वो जन्नत की गली हो या कोई दीगर हसीं शय हो
मेरे भारत से बढ़कर खूबसूरत हो नहीं सकती
वतन की आबरू जिनको नहीं है जान से प्यारी
कभी सीमाओं की उनसे हिफाजत हो नहीं सकती
ये गूंगापन, ये सजदे, बेड़ियाँ और रेंगते रहना
मैं कैसे मान लूँ यारो बगावत हो नहीं सकती
पड़ोसी के फ़राइज़ गर मयंक अपनाएं हम दोनों
उन्हें हमसे, हमें उनसे शिकायत हो नहीं सकती
मंगलवार, 1 सितंबर 2009
गजल- 32
वही राहें बनाता है, वही मंज़िल बनाता है
वही राहों पे चलने के हमें क़ाबिल बनाता है
डुबोने से ज़ियादा उसकी ख्वाहिश है बचाने की
तभी तो एक दरिया और दो साहिल बनाता है
बनाता है बड़ी मेहनत से वो दिलकश, हसीं चेहरे
बचाने को नज़र से उन पे काले तिल बनाता है
जनम लेता है इन्सां इस जहाँ में नेकियाँ लेकर
मगर माहौल उसको संत या क़ातिल बनाता है
हया, पर्दा, झिझक, नज़रें चुराना और चुप रहना
न जाने इशक क्यों इंसान को बुज़दिल बनाता है
ग़रीब इंसान जब आसानियों में ढूंढता है हल
तो अपनी मुश्किलों को और भी मुश्किल बनाता है
मयंक इन्सां सबक़ लेता नहीं जो अपने माज़ी से
वो दोज़ख से भी बदतर अपना मुस्तक़बिल बनाता है
वही राहों पे चलने के हमें क़ाबिल बनाता है
डुबोने से ज़ियादा उसकी ख्वाहिश है बचाने की
तभी तो एक दरिया और दो साहिल बनाता है
बनाता है बड़ी मेहनत से वो दिलकश, हसीं चेहरे
बचाने को नज़र से उन पे काले तिल बनाता है
जनम लेता है इन्सां इस जहाँ में नेकियाँ लेकर
मगर माहौल उसको संत या क़ातिल बनाता है
हया, पर्दा, झिझक, नज़रें चुराना और चुप रहना
न जाने इशक क्यों इंसान को बुज़दिल बनाता है
ग़रीब इंसान जब आसानियों में ढूंढता है हल
तो अपनी मुश्किलों को और भी मुश्किल बनाता है
मयंक इन्सां सबक़ लेता नहीं जो अपने माज़ी से
वो दोज़ख से भी बदतर अपना मुस्तक़बिल बनाता है
सोमवार, 17 अगस्त 2009
गजल- 31
वही हालत है इसकी भी कि जो हालत हमारी है
ज़माना तुमको क्या देगा, ज़माना ख़ुद भिखारी है
हमारे गाँव में इंसानियत है, दोस्तदारी है
तुम्हारे शहर में हर शख्स दौलत का पुजारी है
ज़माने भर के गम सारे चले आते हैं घर मेरे
न इनसे दोस्ती अपनी, न कोई रिश्तेदारी है
मुनासिब है करो अपनी हिफाजत शौक़ से, लेकिन
हमें महफूज़ रखना भी तुम्हारी जिम्मेदारी है
हमें मालूम है पत्थर कभी पूजे नहीं जाते
मगर फिर भी तुम्हारी आरती हमने उतारी है
सवारी और सवार आनन्द दोनों ही उठाते हैं
पिता की पीठ पर बच्चा अगर करता सवारी है
ज़माने को पसंद आए न आए, क्या गरज़ हम को
हमारी हर अदा लेकिन हमारी मां को प्यारी है
किसी की कोई भी अब बद्दुआ लगती नहीं मुझको
मेरी मां ने नजर जब से मेरी आ कर उतारी है
विरासत में कुछ भी चाहिए मुझ को मेरे भाई
मेरे हिस्से में गर मां-बाप की तीमारदारी है
मयंक आया न कोई हस्बे-वादा पुरसिशे-गम को
कि हम ने तारे गिन-गिन कर शबे-फुरकत गुज़ारी है.
ज़माना तुमको क्या देगा, ज़माना ख़ुद भिखारी है
हमारे गाँव में इंसानियत है, दोस्तदारी है
तुम्हारे शहर में हर शख्स दौलत का पुजारी है
ज़माने भर के गम सारे चले आते हैं घर मेरे
न इनसे दोस्ती अपनी, न कोई रिश्तेदारी है
मुनासिब है करो अपनी हिफाजत शौक़ से, लेकिन
हमें महफूज़ रखना भी तुम्हारी जिम्मेदारी है
हमें मालूम है पत्थर कभी पूजे नहीं जाते
मगर फिर भी तुम्हारी आरती हमने उतारी है
सवारी और सवार आनन्द दोनों ही उठाते हैं
पिता की पीठ पर बच्चा अगर करता सवारी है
ज़माने को पसंद आए न आए, क्या गरज़ हम को
हमारी हर अदा लेकिन हमारी मां को प्यारी है
किसी की कोई भी अब बद्दुआ लगती नहीं मुझको
मेरी मां ने नजर जब से मेरी आ कर उतारी है
विरासत में कुछ भी चाहिए मुझ को मेरे भाई
मेरे हिस्से में गर मां-बाप की तीमारदारी है
मयंक आया न कोई हस्बे-वादा पुरसिशे-गम को
कि हम ने तारे गिन-गिन कर शबे-फुरकत गुज़ारी है.
शुक्रवार, 19 जून 2009
गजल 30
तुमने जिसकी जिन्दगी पामाल की
दो इजाज़त उसको अर्जे हाल की
भर लिए दामन में अपने अश्के गम
जिंदगी यूं हमने मालामाल की
इश्क फ़िर फरमाईये किबला हुजूर
फ़िक्र कीजे पहले आटे दाल की
मैं गुजारिश रहम की करता नहीं
दो सजा मुझ्कू मेरे आमाल की
तोड़ कर उड़ जाएगा एक दिन परिन्द
बंदिशे जितनी हैं मायाजाल की
जंग में माँ की दुआएं साथ हैं
क्या ज़रूरत है मुझे अब ढाल की
कम से कम ही बैठ पाती हैं 'मयंक'
पालकी में बेटियाँ कंगाल की ।
गजल 29
देख लीजे जो देखा नहीं
जिंदगी का भरोसा नहीं
गम की शिद्दत उसे क्या पता
दिल कभी जिसका टूटा नहीं
आओगे ख्वाब में किस तरह
मुद्दतों से मैं सोया नहीं
जिसको फूलोसे है उनसियत
वो कभी खार बोता नहीं
देखिये मेरी मजबूरियां
मैं जो चाहूँ वो होता नहीं
आ के साहिल पे क्यों डूबते
नाखुदा जो डुबोता नहीं
छोडिये फ़िक्रे सूदो जियां
इश्क है इश्क , सौदा नहीं
प्यार होता है ख़ुद ही 'मयंक'
प्यार करने से होता नहीं।
जिंदगी का भरोसा नहीं
गम की शिद्दत उसे क्या पता
दिल कभी जिसका टूटा नहीं
आओगे ख्वाब में किस तरह
मुद्दतों से मैं सोया नहीं
जिसको फूलोसे है उनसियत
वो कभी खार बोता नहीं
देखिये मेरी मजबूरियां
मैं जो चाहूँ वो होता नहीं
आ के साहिल पे क्यों डूबते
नाखुदा जो डुबोता नहीं
छोडिये फ़िक्रे सूदो जियां
इश्क है इश्क , सौदा नहीं
प्यार होता है ख़ुद ही 'मयंक'
प्यार करने से होता नहीं।
सोमवार, 15 जून 2009
गजल 28
जो तिरंगे को करना नमन छोड़ दें
उनसे कह दो वो मेरा वतन छोड़ दें।
पंचशील और अहिंसा के हामी हैं हम
क्यों खुलूसो-वफा के चलन छोड़ दें।
'सूर' , 'गालिब' , 'कबीरा' के वारिस हैं हम
क्यों मुहब्बत के लिखना सुखन छोड़ दें।
शहरे कातिल में रहकर मुनासिब नहीं
बाँधना हम सरों से कफन छोड़ दें।
हिंद गौरी के शोलों से डर जाएगा
देखना आप ऐसे सपन छोड़ दें।
ऐ 'मयंक' अब यही वक्त की मांग है
एक दूजे से रखना जलन छोड़ दें।
उनसे कह दो वो मेरा वतन छोड़ दें।
पंचशील और अहिंसा के हामी हैं हम
क्यों खुलूसो-वफा के चलन छोड़ दें।
'सूर' , 'गालिब' , 'कबीरा' के वारिस हैं हम
क्यों मुहब्बत के लिखना सुखन छोड़ दें।
शहरे कातिल में रहकर मुनासिब नहीं
बाँधना हम सरों से कफन छोड़ दें।
हिंद गौरी के शोलों से डर जाएगा
देखना आप ऐसे सपन छोड़ दें।
ऐ 'मयंक' अब यही वक्त की मांग है
एक दूजे से रखना जलन छोड़ दें।
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