सोमवार, 4 मई 2009

ग़ज़ल 17

आपकी जो भी चाल है साहब
वाकई बेमिसाल है साहब
रोज़ आते हैं वह तसव्वुर में
उनको मेरा ख़याल है साहब
चाँद सूरज से भी सिवा यारों
उनका हुस्नो जमाल है साहब
जिसने अंजाम पर नज़र की है
वह परेशान हाल है साहब
रिफ़अतें अब कहाँ हैं किस्मत में
अब तो दिल पायमाल है साहब
अपनी हद से गुज़र गया था मैं
मुझको इसका मलाल है साहब
क्यों मयंक आदमी है छोटा बडा
खून जब सबका लाल है साहब।

1 टिप्पणी:

  1. आप की रचना प्रशंसा के योग्य है . लिखते रहिये
    चिटठा जगत मैं आप का स्वागत है

    गार्गी
    www.abhivyakti.tk

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