गुरुवार, 7 मई 2009

गजल- 18

माना कि एक संग हूँ , शंकर नहीं हूँ मैं
लेकिन किसी की राह का पत्थर नहीं हूँ मैं

आवारगी है मेरा मुकद्दर तो क्या हुआ
सबके दिलों में रहता हूँ, बेघर नहीं हूँ मैं

सबके लबों की प्यास बुझाता हूँ रात दिन
दरिया हूँ मीठे जल का, समन्दर नहीं हूँ मैं

आते नहीं हैं मुझको सियासत के दांव पेंच
राही हूँ राहे इश्क का, रहबर नहीं हूँ मैं

गरचे मेरी उड़ान फलक तक है ऐ मयंक
दुनिया की बंदिशों से भी बाहर नहीं हूँ मैं

4 टिप्‍पणियां:

  1. आते नहीं हैं मुझको सियासत के दांव पेंच
    राही हूँ राहे इश्क का, रहबर नहीं हूँ मैं

    गरचे मेरी उड़ान फलक तक है ऐ मयंक
    दुनिया की बंदिशों से भी बाहर नहीं हूँ मैं

    बहुत ख़ूब. ये शेर तो ब-तौर-ए-ख़ास

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  2. आवारगी है मेरा मुकद्दर तो क्या हुआ
    सबके दिलों में रहता हूँ, बेघर नहीं हूँ मैं

    -बेहतरीन!!

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