रविवार, 24 मई 2009

गजल- 22

क्या पीरी क्या दौरे जवानी
चार दिनों की रामकहानी।

घाट पे जब भी पापी पहुंचा
गंगा हो गई पानी-पानी।

लाख इसे समझाया लेकिन
दिल ने की अपनी मनमानी

घूम रहे हैं कासा लेकर
क्या जनता क्या राजा-रानी।

तेरी यादें ऐसी महकें
रात में जैसे रात की रानी।

तर्के-मुहब्बत तौबा-तौबा
मत करना ऐसी नादानी ।

ड़ूब गई जब दिल की किश्ती
थम गई मौजों की तुग्यानी।

मुझको मयंक ऐसा लगता है
मर गया सबकी आँख का पानी ।

4 टिप्‍पणियां:

  1. रचना अच्छी ही नहीं बहुत ही अच्छी लगी। धन्यवाद।
    ईमेल से भेज सकें अथवा लिंक बना पांए तो आभारी रहूंगा।

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  2. घाट पे जब भी पापी पहुंचा
    गंगा हो गई पानी-पानी।

    तेरी यादें ऐसी महकें
    रात में जैसे रात की रानी।

    बहुत कमाल के शेर कहें है मयंक जी आपने...बहुत बहुत बधाई...
    नीरज

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  3. ganga ho gayi pani pani....waah waah waah .....
    baat toh yahin poori ho gayi janaab, baaki ghazal toh alag se uphar hai...
    bahut khoob,
    BADHAI

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  4. मुझको मयंक ऐसा लगता है
    मर गया सबकी आँख का पानी ।

    बहुत अच्छा मयंक जी।

    इस तरह पानी हुआ कम दुनियाँ में, इन्सान में।
    दोपहर के बाद सूरज जिस तरह ढ़लता रहा।।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman.blogspot.com
    shyamalsuman@gmail.com

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